जीतिया व्रत

जीतिया व्रत
          पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महाभारत युद्ध के दौरान अपने पिता की मृत्यु के बाद अश्वत्थामा बहुत नाराज थे। इस दुख और नाराजगी के चलते उनके मन में बदले की भावना भड़क रही थी। अपनी इसी क्रोध के आगे विवश होकर वे पांडवों के शिविर में घुस गए। जब वह अंदर गए तो उन्होंने देखा कि शिविर के अंदर 5 लोग सो रहे थे। जिसे उन्होंने पांडव समझ कर मार डाला।




 परंतु असल में वे सभी द्रोपदी की पांच संताने थी। कहा जाता है कि इसके बाद अर्जुन ने उन्हें बंदी बनाकर उनकी दिव्यमणि छीन ली। जिसके बाद अश्वत्थामा ने बदला लेने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को/गर्भ को नष्ट कर दिया। मगर भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्य का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में फिर से जीवित कर दिया। गर्भ में मर कर जीवित होने के कारण उस बच्ची का नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा। कहा जाता है कि तब से ही संतान की लंबी उम्र और मंगल कामना के लिए जितिया का व्रत किया जाने लगाव्रत



                      एक दूसरी प्रचलित कथा है की प्राचीन काल में गंधर्वराज नामक जीमूतवाहन बड़े धर्मात्मा और त्यागी पुरुष थे। यह अपनी युवा काल में ही राजपाट छोड़कर वन में पिता की सेवा करने चले गए थे। एक दिन इन्हें भ्रमण करते हुए उन्हें नाग माता मिली जो विलाप में थी। जब जीमूतवाहन ने उनके विलाप करने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया की वे नागवंश गरुड़ से काफी परेशान है। 






अपने वंश की रक्षा करने के लिए गरुड़ से समझौता किया है की वह प्रतिदिन उसे एक नाग खाने को देंगे और इसके बदले में वह हमारा सामूहिक शिकार नहीं करेगा। जिसमें आज उनके पुत्र को गरुड़ के सामान्य जाना है। नाग माता की पूरी बात सुनने के बाद जीमूतवाहन ने उन्हें वचन दिया कि वे उनके पुत्र को कुछ नहीं होने देंगे, बल्कि उनके पुत्र की जगह खुद कपड़े में लिपटकर गरुड़ के समक्ष उस शिला पर लेट जाएंगे जहां से गरूर अपना आहार उठाता है। और उन्होंने ठीक ऐसा ही किया।






 गरूड़ जीमूतवाहन को अपने पंजों में दबाया और पहाड़ की तरफ उड़ने लगा। थोड़ा आगे जाकर जब गरूर ने सोचा कि हमेशा की तरह आज नाग चिल्लाने और रोने की जगह शांत है तो उसने कपड़ा हटाकर जीमूतवाहन को पाया। जिसके बाद जीमूत वाहन ने सारी कहानी गरुड़ को बताई। कहा जाता है कि इस घटना के बाद गरूर ने जीमूत वाहन को छोड़ दिया और उन्हें नागों को न खाने का वचन दिया।

         नर्मदा नदी के पास एक नगर था कंचनवटी। उस नगर के राजा का नाम मलयकेतु था। नर्मदा नदी के पश्चिम में बालूहटा नाम की मरूभूमि थी, जिसमें एक विशाल पाकड़ के पेड़ पर एक चील रहती थी। उसी पेड़ के नीचे एक सियारिन भी रहती थी। दोनों पक्की सहेलियां थी। दोनों ने कुछ महिलाओं को देखकर जितिया व्रत करने का संकल्प लिया और दोनों ने भगवान श्री जीमूतवाहन की पूजा और व्रत करने का प्रण किया! 





 लेकिन जिस दिन दोनों को व्रत रखना था उसी दिन शहर के एक बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गई और उसका दाह संस्कार उसी मरुस्थल में किया गया। सियारिन को अब भूख लगने लगी थी। मुर्दा देखकर वह खुद को रोक ना सकी और उसका व्रत टूट गया। पर चील ने संयम रखा और नियम व श्रद्धा से अगले दिन व्रत का पारन किया। फिर अगले जन्म में दोनों सहेलियों ने ब्राम्हण परिवार में पुत्री के रूप में जन्म लिया। उनके पिता का नाम भास्कर था। 






चील बड़ी बहन थी और उसका नाम शीलवटी रखा गया। शीलवटी की शादी बुद्धिसेन के साथ हुई। सियारिन छोटी बहन बनी और उसका नाम कपूरावती रखा गया। उसकी शादी उस नगर के राजा मलयकेतु से हुई। अब कपूरावती कंचनबटी नगर की रानी बन गई। भगवान जिमुतवाहन के आशीर्वाद से शीलवटी के सात बेटे हुए। पर कपुड़ावती के सभी बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे। कुछ समय बाद शीलवटी के सातों पुत्र बड़े हो गए। अब सभी राजा के दरबार में काम करने लगे। कपुड़ावटी के मन में उन्हें देखकर ईर्ष्या होने लगी। उसने राजा से कह कर सभी बेटों के सर काट दिए। 






उन्हें 7 नए बर्तन मंगवा कर उसमें रख दिया और लाल कपड़े से ढक कर शीलवटी के पास भिजवा दिया। यह देख भगवान जीमूतवाहन ने मिट्टी से सातों भाइयों के सर बनाए और सभी भाई के सिर को धड़ से जोड़ कर उन पर अमृत छिड़क दिया। इस से उन में जान आ गई तथा सातों युवक जिंदा हो गए और घर लौट गए। जो कटे सर रानी ने भेजे थे वे फल बन गए। दूसरी ओर कपुड़ावती बुद्धिसेन के घर से सूचना पाने को व्याकुल थी। जब काफी देर सूचना नहीं आई तो कपुड़ावती स्वयं बड़ी बहन के घर गई।





 वहां सबको जिंदा देखकर वह सन्न रह गई। जब उसे होश आया तो बहन को उसने सारी बात बताई। अब उसे अपनी गलती पर पछतावा हो रहा था। भगवान जीमूतवाहन की कृपा से शीलवटी को पूर्व जन्म की बातें याद आ गई। वह कपुड़ावटी को लेकर उसी पाकड़ के पेड़ के पास गई और उसे सारी बातें बताई। कपुड़ावटी बेहोश होकर मर गई। जब राजा को इसकी खबर मिली तो उन्होंने उसी जगह पर जाकर पाकड़ पेड़ के नीचे कपुड़ावटी का दाह संस्कार कर दिया।

🌺 शुभ जीतिया व्रत 🌺
जीतिया व्रत की हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏
माँ जीउतिया की कृपा से सभी माताओं की संतान सुख, दीर्घायु और मंगल की कामना पूर्ण हो। ❤️
Writing By – Er Durga

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