आम आदमी की उम्र से जलता हुआ सवाल , Hindi Poetry
आम आदमी की उम्र से जलता हुआ सवाल
अच्छी तरह से सोच समझ कर इत्मिनान से
हमने दिया था वोट तुम्हें इस गुमान से
कैसा भी हो समय न डिगोगे ईमान से
सत्ता को तुम चलाओगे हां संविधान से
तुमने कहा था भूख गरीबी मिटाएंगे
सारे वतन में दूध की नदिया बहाएंगे
सच्चे वसूल से ना कदम डगमगाएंगे
खुद को जलाकर भी नया सूरज उगाऐंगे
लेकिन वफा के नाम वफादार क्या किया
मंदिर की देहरी को ही नापाक कर दिया
यह न पता था ऐसे भी तुम दिन दिखाओगे
एक दिन हमें ही गाय की चर्बी खिलाओगे
वो मादरेवतन का सराहना कहां गया
आजाद और भगत का फसाना कहां गया
जिंदादिली का एक वो जमाना कहां गया
अपने वतन पर मिटकर दिखाना कहां गया
हमसे किए थे आज वो वादे कहां गए
सेवा की भावना वो इरादे कहां गए
जनता की जिंदगी के वो नारे कहां गए
बैसाखियां बने वो सहारे कहां गए
गांधी के नाम की वो दुहाई कहां गई
सच्चाई की शपथ जो उठाई कहां गई
राखी बिलख रही वो कलाई कहां गई
मक्खन लगाने बालों मलाई कहां गई
कल तक तो तुम भटकते थे भोजन के वास्ते
फुटपाथ पर तड़पते थे आंगन के वास्ते
दरिया बिछाते रहते थे भाषण के वास्ते
नारे लगाते रहते थे राशन के वास्ते
कुर्सी पर बैठते ही यह सूरत बदल गई
चेहरे पर नूर आ गया रंगत बदल गई
हर तौर तरीका और तबियत बदल गई
इन सब के साथ-साथ नियत बदल गई
सत्ता में पैठ होते ही मलखान हो गए
पहले ही क्या कमी थी जो बेईमान हो गए
रिश्वत की चलती फिरती एक दुकान हो गए
कल के भिखारी आज के धनवान हो गए
तुमको तुम्हारे धर्म इबादत का वास्ता
जम्हूरियत के नाम हिमायत का वास्ता
अपनी नजर के नूर की चाहत का वास्ता
तुमको तुम्हारे प्यार मोहब्बत का वास्ता
बोलो कहां हिसाब है चौथे मकान का
बोली लगा खरीदे गए उस विधान का
दो ढाई वर्ष में ही बने दस दुकान का
पैसा कहां से आया है इस भव्य शान का
है लॉटरी खुली या की जादू जगा लिया
दो-चार साल में ही गजब का कमा लिया
अपनी सदस्यता को समूचा भूना लिया
हमको मिटा-मिटा के स्वयं को बना लिया
हालत देख देख ये हिंदुस्तान के
संस्कार मर गए हो जहां बागवान के
जी चाहता है कह दूं हर एक नौजवान से
ऐलान कर दूं आज कलम के मचान से
अनपढ़ अंगूठा टेक लाचार भाइयों
ओ बेसहारा और निराधार भाइयों
रोजी की खोज में हुए बेजार भाइयों
बेरोजगार और मेरे बेकार भाइयों
धंधे में क्या रखा है पसीना बहाओगे
और नौकरी में व्यर्थ जिंदगी गमाओगे
कितना करोगे खर्च और कितना बचाओगे
सारी उम्र खपा के भी कितना कमाओगे
सौ सौ के नोट चाहिए चमचागिरी करो
ख्वाहिश हजार की हो तो दादागिरी करो
वोटो की राजनीति है सौदागिरी करो
लाखों में खेलना हो तो नेतागिरी करो
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